Sunday, April 21, 2013

हम दिशाहीन नहीं थे, बनाये गए!

File:StateLibQld 1 295751 Eighteen footer sailing boats racing in the Australian Championship on the Brisbane River, ca. 1930.jpg 

कोई प्रश्न नहीं पूछा, कोई व्याख्या नहीं दी
इक तस्वीर दिखाई पनघट की
और छोड़ दिया
उफनते विचारों के बीच भंवर में
कोई दिशा निर्देश नहीं, कोई पतवार नहीं थी
बस नौकाओं की कतार हर कहीं
सो  मोड़ दिया
नौका का रुख, कस के डोर कमर में
उस ओर जहाँ सब नौकाएं बढ़ी जा रही थी
सबको बस पहुँचने की जल्दी थी
लहरें आतुर थी
भीतर अपने हमें समाने के चक्कर में
एक द्वीप दिखा सागर में, नौकाएं सबकी
टकराईं, हमने भी तुमने भी
और तोड़ दिया
नौका को सपने सा, निहत्थे महा समर में
हम लड़ते रहे व्यर्थ उनके मनोरंजन के लिए
जिन्होंने तट पर बने महलों में
बैठ हमें पनघट का चित्र दिखाकर
और जलपरिओं की कथाएं सुनाकर
दिशाहीन बनाया
और छोड़ दिया
उफनते विचारों के बीच भंवर में.

चित्र wikipedia से लिया गया है, अगर ये आपकी अधिकारिक संपत्ति है तो मेसेज करें और मैं इसे हटा दूँगा.

Monday, March 25, 2013

शक्ति का संघर्ष (II) - धर्मं

जारी ..
अपने  इस लेख के माध्यम से मैं शक्ति के संघर्ष को विस्तार से परिभाषित करने का प्रयास कर रहा हूँ. मैं स्वयं इस खोज में लगा हूँ कि आखिर शक्ति के आज के इस विश्वस्तरीय संघर्ष में सबसे अहम भूमिका किसकी है?
क्या वो धर्म की है, या जाति की, या भाषा की, या राष्ट्रवाद की, या लिंग की, या फिर पैसे की?
क्या ये अपना वर्चस्व स्थापित करने की लड़ाई है?
या फिर ये सिर्फ अपना अस्तित्व बरक़रार रखने का संघर्ष है?

हमारा ईश्वर तुम्हारे ईश्वर से बड़ा है.

तुम्हारा ये लिबास हमसे मेल नहीं खाता, 
तुम्हारी भाषा हमें समझ नहीं आती,
तुम्हारा  रंग चेहरे का हमे रास नहीं आता,
तुम्हारे घर की छत इतनी ऊँची क्यूँ,
तुम्हारा खान पान भी हमे नहीं भाता
 तुम हमसे भिन्न हो, तुम्हे इसका दंड मिलेगा
क्यूँकि तुम ठहरे बीस हम सहस्त्र हैं खड़े
तुम्हारा सत्य नगण्य है हमारे सत्य के समक्ष
 इसलिए हम सही हैं और तुम गलत.
हमे चुना गया है तुम्हे सही राह दिखाने को
क्यूंकि हमारा ईश्वर तुम्हारे ईश्वर से बड़ा है.




इतिहास के पन्नों में अंकित है कि मानव सभ्यता पिछले ८००० वर्षों के दौरान, सिर्फ ३०० वर्षों में शांति के साथ रही है अन्यथा परस्पर विवाद और युद्ध होते आ रहे हैं. धर्म ने शक्ति के संघर्ष में आग में घी की भूमिका निभाई है. ये सिर्फ हमारा एक सुखद भ्रम है कि ईश्वर और धर्म मनुष्य के जीवन में सुख और शांति प्रदान करते हैं.
धर्म की चर्चा को मैं यहाँ एक विराम दे रहा हूँ.

समाप्त


Wednesday, March 20, 2013

शक्ति का संघर्ष (II) - धर्म

जारी ....
धर्म की उत्पत्ति, विकास और प्रभाव 

पिछली कड़ी में मैंने ये बताने कि कोशिश की थी कि कैसे धर्म शक्ति हासिल करने और लोगों पर शासन करने का एक माध्यम है. लेकिन अगर मैं सिर्फ यही कहने तक सीमित रह जाऊं कि धर्म सिर्फ शक्ति अर्जित करने का माध्यम था और कुछ नहीं तो मैं आपको सारे तथ्य नहीं बता पाऊंगा.
प्रकृति के संसाधन हर किसी को बराबर भाग में नहीं मिलते. संसार की हर प्राचीन सभ्यता एक दूसरे से विषम परिस्तिथिओं में विकसित हुईं हैं. इसीलिए उनके ईश्वर और धार्मिक ग्रन्थ भिन्न हैं. पर एक मूलभूत विचार जो हर धार्मिक ग्रन्थ और हर नयी पुरानी सभ्यता इतिहास में साफ़ साफ़ अंकित है वो है प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाना और प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल करना. जब पृथ्वी पर सभ्यताओं के अंकुर फूट रहे थे तब मनुष्य का जीवन अव्यवस्थित और अराजक था. ऐसे में मानव समाज को, जो विश्व की महान नदियों और समुद्र के किनारे फल फूल रहा था, दिशा और नियम की आवश्यकता थी.
यही वो महत्त्वपूर्ण समय है जब धर्म ने मनुष्य को प्रकृति से जोड़ा और प्राकृतिक संसाधनों का आदर करने के लिए कई धर्मों ने उन्हें ईश्वरीय रूप दिया. इन नियमों को मानने या न मानने पर मनुष्य के पास पुरस्कार या दंड के ही विकल्प थे.
इसके अलावा हर धर्म के ऋषिओं, पैगम्बरों और गुरुओं ने प्रकृति के नियमों को समझने और समझाने का भी प्रयत्न किया. ऋतुओं के चक्र का उल्लेख हुआ , पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और प्रमुख ग्रहों के प्रावेदन और उसके कथित प्रभावों का भी अध्ययन किया गया.
धर्म ने समाज में नैतिकता प्रयुक्त की और सही गलत में अंतर बताने के लिए एक शक्तिशाली , अपरिमित और निष्पक्ष ईश्वर स्थापित किया. ये सभ्यताओं का स्वर्णिम समय था.

पर शक्ति किसी को भी भ्रष्ट कर सकती है चाहे वो धर्म हो या मनुष्य. और अपने शक्ति के अहंकार में धर्म के प्रचारकों ने अपनी त्रुटियाँ देखने से इनकार कर दिया. विज्ञान पढ़ने और पढाने वालों को कैद किया गया, यंत्रणा दी गयी या हत्या कर दी गयी. धर्म में संशोधन और विकास की कोई गुंजाइश नहीं रखी गयी.
धर्म ने पुरुष और स्त्री में भी भेदभाव किया और लगभग सभी प्रमुख धर्मों ने स्त्री को अधीनस्थ बताया. (नारी-शक्ति के ऊपर विस्तार से चर्चा अगले भाग में करूँगा.)
जब कोई भी वस्तु शिथिल हो जाती है तो वह निष्क्रिय होने लगती है. इसलिए मेरे अनुसार आज संसार के सभी प्राचीन धर्म लगभग निष्क्रिय हो गए हैं और वर्तमान में ये नकारात्मक बल का ही काम कर रहे हैं. शक्ति के संघर्ष में "धर्म", "अर्थ" (मुद्रा) और "राज्य" (state/administration) के सामने फीका पड़ने लगा है. लेकिन आज भी "धर्म" मनुष्य के जीवन का और हमारे समाज की व्यवस्था में एक  महत्त्वपूर्ण अंग है.
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...क्रमशः

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