Sunday, November 18, 2012

वो मेरा गाँव ये तेरा शहर

तुम मुझे अपने शहर की शाम दिखा रहे हो,
कभी मेरे गाँव आओ, मेरा सुनहरा सवेरा देखो

ये कृत्रिम चकाचौंध रातों की, फीकी लगती है, उनको 
जो सितारों के उजालों में सोते हैं

तुम्हारा बोतलों में बंद पानी, बनावटी लगता है,
मेरे गाँव में छोटी नदी है,
पानी बहुत मीठा है उसका.

सब डिब्बे में बंद बिकता यहां,
बेजान आतिशें बेरंग होली यहाँ,
यहाँ पहली बारिश की खुशबू नहीं आती .

हवा से ज्यादा तुमलोगों की बातों में जहर घुला है,
बंद कमरे की छत से अच्छा मेरा आकाश खुला है

बहुत डर लग रहा है मुझे आजकल,
ये तुम्हारा शहर दौड़ता ही आ रहा है मेरे गाँव की ओर.

Friday, October 12, 2012

आकाश का वो हिस्सा मेरा है

३ साल से ऊपर हो गए मुझे कोटा से वापस आये पर कोटा मेरे मन से निकला नहीं.
कोटा एक ऐसी जगह है जहाँ से नफरत और प्यार साथ हो जाता है. धूप इतनी होती है की पसीने के साथ खून भी खींच ले! रातें दिन कब बनती है और दिन कब ढलता है इसका किसीको पता नहीं होता. रास्तों पर "maths", "physics", "chemistry" की "equations" हल की जाती हैं और रविवार को सड़कों पर जो काफिला होता है वो देखने लायक होता है. कोटा से प्यार पहली नजर में हो जाता है, फिर कुछ महीनों में यही प्यार ऐसी आदतें बना देता है जो आप कल्पनाओं में भी खुद को करते हुए नहीं देख पाता जैसे कई कई रातों तक लगातार जागना, घंटो तक एक ही सवाल से जूझना और फिल्में देखना. ऐसा हो ही नहीं सकता की कोई कोटा जाए और उससे फिल्में देखने का चस्का न लगे. आप के आदर्शों में कई नाम और जुड जाते हैं, आप अपने "faculty" को भगवान/शैतान का भेजा दूत मानते हो और ये भी एक साथ होता है. आप लाखों की भीड़ का हिस्सा बन जाते हो, फिर आप अपने आप को उस भीड़ से अलग करने की जद्दोजेहद में लग जाते हो. जो कामयाब होते हैं वो आइआईटी और एम्स में जाते है, बाकि अपने घरों को. ये कविता एक स्वार्थी दिल से निकली है, ये मेरा और मेरे जैसे हजारों लोग जो लाखों के भीड़ में खो गए उनका कहा-अनकहा सच है.
       "सीमायें मेरे सपनों की तुमने कब से तय कर दीं,
         मेरे पंखों की दिशाएं तुमने क्या से क्या कर दीं,
         जितने रंग थे मेरे वो छूपा ले गए, सिर्फ एक स्याही की कलम थमा दी,
        मैं लिखूंगा जो दिल चाहे, क्या लिखना है अब न बताओ मुझको
        मैं सीख लूँगा जब समय आएगा, यूँ वक्त-बेवक्त न सिखाओ मुझको.
        ये कैसी ऐनक से देखते हो दुनिया को, और वो भी मेरी दुनिया को.
        ये बचपन मेरा है, तुमसब बड़े लोग यूँ अधिकार न जमाओ इसपर.
        मैं लाऊंगा अपने रंग, और मोडूँगा अपने पंख जिधर जिद है उड़ने की मेरी.
       क्यूंकि, वो जो दिख रहा है न कोने में पड़ा, आकाश का वो हिस्सा मेरा है."

Thursday, July 5, 2012

चासनी

हम अपनी नयी दुनिया में ढल गए थे,
वो प्रातः उठाना और फिर सो जाना.
बिलकुल आखिरी क्षण कक्षा में आते थे,
बाल बिखरे और आँख मींचे रोजाना.
आइने की फिक्र करना भूल गए थे,
कैंटीन की सस्ती चाय से सुस्ती मिटाना
किताबों से अधिक अंतरजाल प्यारा लगने लगा
सवेरे से संध्या तक बस स्क्रीन पर आँखें टिकाना
यारों के संग टहलने लगे थे निशाचरों की भांति
यौवन का दंभ था कहते कि लायेंगे हम भी क्रांति
आँहें भी भरते थे गलियारों में उनको देखकर
मुस्कुराती आँखें मिलती तो पूरा दिन बन जाना
साल बीतने को है, जाने अब कब बात होगी
यारों से बिछड़ने कि बात पर दिल का ठिठक जाना
छुट्टियों  में घर तो सिर्फ सेहत बनाने जाने थे
बड़े अंतराल पर मिलता था माँ के हाथ का खाना
आखिरी साल है, कॉलेज अब खत्म होने को है, सब खट्टा-मीठा लग रहा है
बगैर चासनी जो शरबत पिलाई थी यारों ने, उसका स्वाद याद आ रहा है

Wednesday, March 28, 2012

अब मेरे जाने का क्षण आया है

अभी रोक न मुझको, अभी है जाना
अभी  जलता देश है उसे बचाना
क्यूँ व्यर्थ मनोहर बातों में तुम डूबे हो
क्यूँ संसार के क्षद्मों में तुम झूमे हो
हैं स्वप्न ये सारे, क्यूँ पलकें मूँद के सो जाना
यदि आँख खुले, मेरे पीछे आ जाना

मैं भी था मूरख , बड़ी देर भीड़ में खड़ा रहा
भीतर भीषण थी आग लगी, ऊपर सूरज था तपा रहा
घनघोर घटा बनके अब, भूमंडल पर है छा जाना
अभी जलता देश है उसे बचाना

जगत में मेरा जीवन क्षणिक है, अपूर्ण है
जितना भी अब शेष है, उसे राष्ट्रहित में लगाना
अभी रोक न मुझको, अभी है जाना
अभी  जलता देश है उसे बचाना

कुछ अभिलाषाएं हैं, कि सत्य जो ढंके है आवरण में
मरने से पहले अपने सत्य धरातल पर चिन्हित कर जाना
कि बनके भागीरथ फिर पवन गंगा को लाना
इस जलती रक्तरंजित भूमि को जलमग्न कराना
अभी रोक न मुझको, अभी है जाना
अभी  जलता देश है उसे बचाना


Tuesday, August 2, 2011

मेरे शहर के हिन्दुस्तानी

आज पंद्रह अगस्त है, उन्हें फिर वतन कि याद आई है.
अभी जायेंगे अपने बच्चे के लिए तिरंगा लेंगे;
एक छोटा सा तिरंगा इनकी कमीज पर भी सजा है.
वतन की याद आई क्योंकि छुट्टी थी आज दफ्तर में;
वरना इस शहर में वतन को याद कौन करता है.
टीवी पर देखेंगे दिल्ली में तिरंगा फहराया है किसी ने,
राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री परवाह कौन करता है.
ये वहीँ हैं जो चौक चौराहों पर कहते हैं-
"इस देश का कुछ नहीं हो सकता"
इनसे न कहना कि खड़े हों राष्ट्रगान कि धुन पर;
इन्हें राष्ट्र के प्रति कर्तव्य याद न दिलाना;
ये अकर्मण्यता को भय के आवरण से ढक लेते हैं.
आज छुट्टी का दिन है आराम करने दो इन्हें.
कल फिर पैसे की चूहादौड़ में जाना है इन्हें;
कल फिर शहर की भीड़ में खो जाना है इन्हें.

Wednesday, July 6, 2011

Swapna aur Swatantrata

ussne kaha-
agar surya nahi ho to?
maine kaha surya nahi, chandra nahi to diye ka hi sahi par prakash hoga.
diye ki nahi to mashal ki, nahi to jugnuon ki
timtimati sahi..par raushni hogi.
phir ussne kahak prakash hi nahi to?
maine kaha prakash nahi to drishti nahi,
chitra nahi... par dhwani hogi..ped se takraate pawan ki, badalon ki garaz hogi.
badalon ki garaz nahi, hawa ki dhun nahi... to kadamtal hogi sainiko ki.
Ussne kaha dhwani nahi, sangeet nahi tumhare
aur mere swar nahi to?
maine kahan dhwani nahi,
prakash nahi, chitra nahi sangeet nahi par vichar honge...Jinhe sparsh karke bata denge hum...sparsh nahi, dhwani nahi, prakash nahi to?
to swapna nahi aur swatantrata nahi.

Saturday, November 27, 2010

कुछ रंग ये भी .....

वो छत पर बैठी हुई शाम का रंग
घुटनों को सीने से समेटी शरद की उदास अकेली शाम का रंग.
रंग उसके होठों पर छाई ख़ामोशी का भी और आँखों से झलकती मायूसी का भी

टूटे खपरैल से झांकती उषा की लकीर का रंग
रंग खपरैल का भी और साथ लगे सूखे बांस की सीढ़ी का भी

जर्जर दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर का रंग
रंग फोटो फ्रेम का भी और दीवार से झरते चूने का भी

कबाड़ के ढेर में शामिल अलमारी के कोने में पड़ी,
हर दिन थोड़ा और सिलती हुई किताब के पन्नों का रंग
रंग किताब का भी और स्याह अक्षरों का भी

सब रंग मेरे अकेलेपन के .....

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