Thursday, August 2, 2018

बेचैन

बेचैन हूँ मैं कौन हूँ,ये सोचकर
मैं कौन हूँ, बेचैन हूँ ये जानकर

कहाँ खड़ा हूँ, किधर मुड़ा हूँ,
अपनी यादें रोके अवाक् पड़ा हूँ 

बहुत तेज़ धड़कता है,
दिल हर बात पर अटकता है

क्या सच है क्या स्वप्न मेरे
और क्या मेरे मन का भ्रम?

मेरे प्रश्न नहीं रुकते
मेरा अहम् नहीं सुनता

बेचैन हूँ मैं कौन हूँ, ये जानकर
मैं कौन हूँ, बेचैन हूँ ये सोचकर.



Wednesday, April 4, 2018

मैं निशब्द हो गया

तुमसे करने को बातें इतनी सारी हैं
व्यंग्य है, अवसाद है, हंसी ठिठोली है
यादों का पूरा गुलदस्ता है

दुनिया सिमट जाती है मुट्ठी में,
और कल्पना उड़ान भरने लगती है
विचारों का पूरा बक्सा है

वाद-विवाद और पंक्तियाँ कविता की
सुनाने को गीत, बनाने को किस्से
मेरी इच्छाओं का बस्ता है

लेकिन जब तुम सामने होती हो
सारी बातें हवा हो जाती है, सिर्फ
तुम्हारा चेहरा दिखता है

कोई शब्द पर्याप्त नहीं लगता
क्यूंकि तुम्हे बयां करने को शब्द नहीं बने है
या शायद तुमने मुझे निशब्द कर दिया है

कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

अरे तेरी जरुररत है, क्यूँ भाग जाता है
अभी यहीं थम के बैठ, मेरे पास वक़्त बिता
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे?

मैं जिस पल में आँख मूँद सोचता हूँ नाम उसका
उस एक पल में तू क्यूँ भाग जाता है
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

वर्तमान में, भविष्य में और भूतकाल में हो आता है
क्यूँ एक साथ हर समय में रहता है
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

मैं पिंजरे में बंद पन्छी हूँ, मुझे मेरी सीमा पता है
पर तू उन्मुक्त पवन है, फिर भी मुझे छोड़
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

Sunday, February 21, 2016

प्रियतम रूसे बैठी.

कितने तारे देख गगन में
कितने तारे तोड़ के लाऊं
प्रियतम मुझसे रूसे बैठी
क्या करके मैं उसे मनाऊं

उसके रूप की करूँ प्रशंषा
या मन का मैं हाल सुनाऊं
उसकी भौंहे चढ़ी हुई हैं
कैसे उसका हिय पिघलाऊं

लेकर आया कांच की प्रतिमा
प्रतिमा तल पर बिखरी है
जाने कौन सी बात को लेकर
वो अब भी हम पर बिफरी है

मोती चुनके माला बुन लूँ
सीप अनोखे सारे चुन लूँ
कितना गहरा सागर ठहरा
कितने गोते कहो लगाऊं

मैं ठहरा निर्धन दरिद्र
सोने चांदी कहाँ से लाऊं
है जतन तो कोई मुझे बताओ
क्या करतब मैं कर दिखलाऊं

प्रियतम मुझसे रूसे बैठी
क्या करके मैं उसे मनाऊं

Thursday, April 17, 2014

हाँ हाँ, मैं भी "vote" दे रही हूँ इस बार.

सन २०१४ में कुछ आश्चर्यजनक हो रहा है. दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र (आबादी के आधार पर) भारत में इस बार आम चुनाव हो रहे हैं. इस बार ८१ करोड़ से ज्यादा भारतीय मतदान करने वाले हैं. इनमे से ११ करोड़ ऐसे हैं जो पहली बार मतदान करेंगे. यही नहीं, इन ८१ करोड़ मंदाताओं में से ४० करोड़ मतदाता युवा वर्ग यानि ३५ से कम आयु के हैं. मैं उसी युवा वर्ग का हिस्सा हूँ . एक ऐसा वर्ग जिसने भारत में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं.

मेरा ये मानना है कि हम सिर्फ आधुनिक जीवनशैली के वशीभूत जीने वाले लोग नहीं हैं जो २४ घंटे सातों दिन बारहों महीने अपने cellphone की स्क्रीन में डूबा रहता है. हम अपने आस पास की घटनाओं से अनछुए नहीं हैं. हम उसका हिस्सा है, हम युवा हैं एक नौजवान देश का. एक परिपक्व युवा वर्ग जो जीवंत है, आगे की सोच रखता है, पिछली रीतिओं और बन्धनों को तोड़ रहा है. एक ऐसा वर्ग जो सवाल पूछने से हिचकिचाता नहीं है. ये अभूतपूर्व परिस्तिथि है. इस बार आम चुनाओं में कुछ अद्भुत हो रहा है. ये युवा भारत है और ये कभी सोता नहीं है.


मैंने एक छोटा सा सर्वेक्षण किया. मैं अपनी महिलमित्र-मंडली के विचार जानना चाहता था इस बार हो रहे चुनावों और बदलते राजनैतिक समीकरणों के बारे में. मुझे कुछ अद्भुत देखने को मिला. आमतौर पर राजनीति से, चुनावी मुद्दों से, आर्थिक और सामाजिक सवालों से दूर रहने वाली लड़कियां न सिर्फ इन विषयों पर वाद-विवाद कर रही है बल्कि प्रश्न पूछ रही है. अपने विचारों को शक्ति के साथ सामने रख रही है. ये वही लड़कियां हैं जिनपर कभी "अपनी सीमा से ज्यादा" स्वछन्द होकर जीने के लिए, आधुनिक कपडे पहनने के लिए, आधुनिक सोच रखने के लिए सवालिया निगाहों से देखा जाता है, कोसा जाता है और हमारी संस्कृति को भ्रष्ट करने का आरोप झेलना पड़ता है. मुलायम सिंह और आजम खान जैसे नेताओं के बयानों को ये बारीकी से देख सुन और समझ रही है. शीला दीक्षित और ममता बनर्जी के स्त्री-विरोधी विचार भी याद हैं इन्हें.

मेरे सर्वेक्षण में तकरीबन 60 फ़ीसदी लड़कियां भारतीय जनता पार्टी और उसके प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी का समर्थन कर रही हैं. बाकि 30 फ़ीसदी आम आदमी पार्टी की सोच से प्रभावित हैं. केवल कुछ ही ऐसी थी जो अभी भी राजनीति को घृणा की दृष्टि से देखती हैं. और ये विचार किसी विज्ञापन या किसी धरने से प्रभावित नहीं थे. ये इनके अपने विचार थे. मैंने इन सबसे विस्तार से बात की और इनके समर्थन या विरोध का कारण भी पूछा. महिलाओं की सुरक्षा, सामाजिक और धार्मिक समानता, आर्थिक नीतियों पर सामंजस्य जैसे विषयों पर इन्होने अपने विचार दिए. इनके उत्तर ऐसे थे जो हमारे नेताओं को निशब्द कर देंगे. कुछ नया होने वाला है. पूरा देश इन्हें देख रहा है और ये पूरे देश को.

इन्होने तो तय कर लिया है. आप भी जागो. इस बार मतदान जरूर करना. भारत का भविष्य कैसा होगा ये अब हम पर निर्भर करता है.
जय हिन्द.

Sunday, December 22, 2013

ऐ शाम तू कब आई, पता ही नहीं चला.


मैं उगते सूरज की राह तकते, सोया नहीं था रात भर
ऐ शाम तू कब आई पता ही नहीं चला
कल समय से कहकर आना, तेरे आने पर धीमे चले
बहुत जलता है वो मुझसे जब तू मेरे साथ होती है
मेरे कन्धों पर हाथ रखा, हौले से मेरी पीठ थपथपाई
ऐ शाम तू कब आई .....

पहले तो रात से छुपा कर चिट्ठियां छोड़ दिया करती थी
तेरी आखिरी चिठ्ठी कब आई पता ही नहीं चला
देख रात नाराज़ है मुझसे, तू मेरे लिए उससे बात कर
अरसों से मुझे नींद नहीं आई 
ऐ शाम तू कब आई .......






Monday, October 7, 2013

मेरा अक्स, मेरा साया, घर का आइना और घुप्प अँधेरा

१. मैं खाता हूँ कसमे आईने की
    और तोड़ देता हूँ आइना ही. 
    चिर काल से कसम खा रहा हूँ,
    घर में एक भी शीशा नहीं बचा
    आखिर खफा किससे हूँ,
    आईने से या अपने वादों से
    या शायद अपनी सूरत से नाराज़ हूँ,
    कि अपने अक्स से नजरें नहीं मिलानी अब.

२. वक़्त रोज़ यूँ भागता हैं
    मानो कल मिलेगा नही
    एक शह दे रखी है जिंदगी ने
    मेरी मात का इंतज़ार है
    तैयार बैठे हैं सारे साए 
    अँधेरे कोनों में घात लगाये
    एक हम हैं जो हस देते हैं देखकर
    कि अपना साया भी कोने में छुप गया है अब.

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