Monday, October 15, 2018

एक किताब तुम्हारी आँखों में

एक किताब तुम्हारी आँखों में

जब जब पलक झपकते हो
कुछ पृष्ठ पलट जाते हैं

अपनी कहानी कहने को
तुम्हारे होंठ थरथराते हैं

तुम अपने मन की यादों में
रहने चले जाते हो

कोई वो किताब पढ़ ले
इसलिए खुला छोड़ देते हो

अपनी आँखों मे यादों के पन्ने

Friday, August 24, 2018

रात

देखो बेख़ौफ़ सा कौन है जा रहा
इस रात में इस पहर
बढ़ती सिकुड़ती परछाइयों के बीच

लम्बे लम्बे डग भरता हुआ
हथेलियों को कोट में डाले
सड़क पर बारिश की काइयों के बीच

शाम से बारिश हो रही धीमे धीमे
लेकिन बेफिक्र होकर भीग रहा
अपनी आती जाती अंगड़ाइयों के बीच

उसका गंतव्य क्या है, निश्चित ही
उसको आदत है ऐसे सफ़र की
अँधेरी रात की गहराइयों के बीच

मैं खिड़की से देख रहा हूँ,
स्ट्रीट लैंप की रौशनी में उसका चेहरा
रात में भी चमक रहा है.

Thursday, August 2, 2018

बेचैन

बेचैन हूँ मैं कौन हूँ,ये सोचकर
मैं कौन हूँ, बेचैन हूँ ये जानकर

कहाँ खड़ा हूँ, किधर मुड़ा हूँ,
अपनी यादें रोके अवाक् पड़ा हूँ 

बहुत तेज़ धड़कता है,
दिल हर बात पर अटकता है

क्या सच है क्या स्वप्न मेरे
और क्या मेरे मन का भ्रम?

मेरे प्रश्न नहीं रुकते
मेरा अहम् नहीं सुनता

बेचैन हूँ मैं कौन हूँ, ये जानकर
मैं कौन हूँ, बेचैन हूँ ये सोचकर.



Wednesday, April 4, 2018

मैं निशब्द हो गया

तुमसे करने को बातें इतनी सारी हैं
व्यंग्य है, अवसाद है, हंसी ठिठोली है
यादों का पूरा गुलदस्ता है

दुनिया सिमट जाती है मुट्ठी में,
और कल्पना उड़ान भरने लगती है
विचारों का पूरा बक्सा है

वाद-विवाद और पंक्तियाँ कविता की
सुनाने को गीत, बनाने को किस्से
मेरी इच्छाओं का बस्ता है

लेकिन जब तुम सामने होती हो
सारी बातें हवा हो जाती है, सिर्फ
तुम्हारा चेहरा दिखता है

कोई शब्द पर्याप्त नहीं लगता
क्यूंकि तुम्हे बयां करने को शब्द नहीं बने है
या शायद तुमने मुझे निशब्द कर दिया है

कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

अरे तेरी जरुररत है, क्यूँ भाग जाता है
अभी यहीं थम के बैठ, मेरे पास वक़्त बिता
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे?

मैं जिस पल में आँख मूँद सोचता हूँ नाम उसका
उस एक पल में तू क्यूँ भाग जाता है
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

वर्तमान में, भविष्य में और भूतकाल में हो आता है
क्यूँ एक साथ हर समय में रहता है
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

मैं पिंजरे में बंद पन्छी हूँ, मुझे मेरी सीमा पता है
पर तू उन्मुक्त पवन है, फिर भी मुझे छोड़
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

Sunday, February 21, 2016

प्रियतम रूसे बैठी.

कितने तारे देख गगन में
कितने तारे तोड़ के लाऊं
प्रियतम मुझसे रूसे बैठी
क्या करके मैं उसे मनाऊं

उसके रूप की करूँ प्रशंषा
या मन का मैं हाल सुनाऊं
उसकी भौंहे चढ़ी हुई हैं
कैसे उसका हिय पिघलाऊं

लेकर आया कांच की प्रतिमा
प्रतिमा तल पर बिखरी है
जाने कौन सी बात को लेकर
वो अब भी हम पर बिफरी है

मोती चुनके माला बुन लूँ
सीप अनोखे सारे चुन लूँ
कितना गहरा सागर ठहरा
कितने गोते कहो लगाऊं

मैं ठहरा निर्धन दरिद्र
सोने चांदी कहाँ से लाऊं
है जतन तो कोई मुझे बताओ
क्या करतब मैं कर दिखलाऊं

प्रियतम मुझसे रूसे बैठी
क्या करके मैं उसे मनाऊं

Thursday, April 17, 2014

हाँ हाँ, मैं भी "vote" दे रही हूँ इस बार.

सन २०१४ में कुछ आश्चर्यजनक हो रहा है. दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र (आबादी के आधार पर) भारत में इस बार आम चुनाव हो रहे हैं. इस बार ८१ करोड़ से ज्यादा भारतीय मतदान करने वाले हैं. इनमे से ११ करोड़ ऐसे हैं जो पहली बार मतदान करेंगे. यही नहीं, इन ८१ करोड़ मंदाताओं में से ४० करोड़ मतदाता युवा वर्ग यानि ३५ से कम आयु के हैं. मैं उसी युवा वर्ग का हिस्सा हूँ . एक ऐसा वर्ग जिसने भारत में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं.

मेरा ये मानना है कि हम सिर्फ आधुनिक जीवनशैली के वशीभूत जीने वाले लोग नहीं हैं जो २४ घंटे सातों दिन बारहों महीने अपने cellphone की स्क्रीन में डूबा रहता है. हम अपने आस पास की घटनाओं से अनछुए नहीं हैं. हम उसका हिस्सा है, हम युवा हैं एक नौजवान देश का. एक परिपक्व युवा वर्ग जो जीवंत है, आगे की सोच रखता है, पिछली रीतिओं और बन्धनों को तोड़ रहा है. एक ऐसा वर्ग जो सवाल पूछने से हिचकिचाता नहीं है. ये अभूतपूर्व परिस्तिथि है. इस बार आम चुनाओं में कुछ अद्भुत हो रहा है. ये युवा भारत है और ये कभी सोता नहीं है.


मैंने एक छोटा सा सर्वेक्षण किया. मैं अपनी महिलमित्र-मंडली के विचार जानना चाहता था इस बार हो रहे चुनावों और बदलते राजनैतिक समीकरणों के बारे में. मुझे कुछ अद्भुत देखने को मिला. आमतौर पर राजनीति से, चुनावी मुद्दों से, आर्थिक और सामाजिक सवालों से दूर रहने वाली लड़कियां न सिर्फ इन विषयों पर वाद-विवाद कर रही है बल्कि प्रश्न पूछ रही है. अपने विचारों को शक्ति के साथ सामने रख रही है. ये वही लड़कियां हैं जिनपर कभी "अपनी सीमा से ज्यादा" स्वछन्द होकर जीने के लिए, आधुनिक कपडे पहनने के लिए, आधुनिक सोच रखने के लिए सवालिया निगाहों से देखा जाता है, कोसा जाता है और हमारी संस्कृति को भ्रष्ट करने का आरोप झेलना पड़ता है. मुलायम सिंह और आजम खान जैसे नेताओं के बयानों को ये बारीकी से देख सुन और समझ रही है. शीला दीक्षित और ममता बनर्जी के स्त्री-विरोधी विचार भी याद हैं इन्हें.

मेरे सर्वेक्षण में तकरीबन 60 फ़ीसदी लड़कियां भारतीय जनता पार्टी और उसके प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी का समर्थन कर रही हैं. बाकि 30 फ़ीसदी आम आदमी पार्टी की सोच से प्रभावित हैं. केवल कुछ ही ऐसी थी जो अभी भी राजनीति को घृणा की दृष्टि से देखती हैं. और ये विचार किसी विज्ञापन या किसी धरने से प्रभावित नहीं थे. ये इनके अपने विचार थे. मैंने इन सबसे विस्तार से बात की और इनके समर्थन या विरोध का कारण भी पूछा. महिलाओं की सुरक्षा, सामाजिक और धार्मिक समानता, आर्थिक नीतियों पर सामंजस्य जैसे विषयों पर इन्होने अपने विचार दिए. इनके उत्तर ऐसे थे जो हमारे नेताओं को निशब्द कर देंगे. कुछ नया होने वाला है. पूरा देश इन्हें देख रहा है और ये पूरे देश को.

इन्होने तो तय कर लिया है. आप भी जागो. इस बार मतदान जरूर करना. भारत का भविष्य कैसा होगा ये अब हम पर निर्भर करता है.
जय हिन्द.

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