Tuesday, August 23, 2022

देशहित

 देशहित में है निहित कुछ स्वार्थ मेरा

कुछ लोभ तुम्हारा भी हो जाए तो बात हो 


देश को बचाने निकले हैं नौजवान 

वो अपना घर बचा लें पहले तो बात हो 


सब शास्त्र और शस्त्र त्याग दो अनुज 

सम्पूर्ण श्वास से शंखनाद हो तो बात हो 


होता है निश्चित हृदय कल्पित तुम्हारा 

अपने संकल्प को विश्वास दो फिर बात हो 


दो राहें नहीं हैं मिथ्या है मनुष्य के आकार

कहीं नहीं जाने वाला कोई सब साक्षात् हो


चीटीयों के वजन जितना मनुष्य है इसलिये

देवत्व का भ्रम देने वाला अहंकार समाप्त हो 


फिर देशहित की बातें भी कर लेंगे 


Tuesday, July 9, 2019

शिव

मैं शिव का हूँ
मैं शिव से हूँ
मैं शिव में हूँ
मैं शिव हूँ

मैं शून्य हूँ सम्पूर्ण हूँ
मैं अपरिमित अपूर्ण हूँ
मैं सूक्ष्म हूँ ब्रम्हांड हूँ
मैं शिव हूँ

तुम शिव के हो
तुम शिव से हो
तुम शिव में हो
तुम शिव हो

तुम शक्ति अपरंपार हो
तुम सृजन हो साकार हो
तुम सौम्य हो प्रचंड हो
तुम शिव हो

शिव शक्ति है
शक्ति शिव है
प्रतिबिम्ब है
निरंतरता है
ये जगत सांस ले रहा है
तुम शिव बन रहे हो
मैं शिव बन रहा हूँ

Monday, October 15, 2018

सपनों को अधूरा छोड़ रखा है

सपनों को सिरहाने अधूरा छोड़ रखा है
बिस्तर पर सिलवटों में नींद की परछाईयाँ

सुबह उठने पर सपना टूट जाने का अफसोस
और थक हार कर भागमभाग वाली जिंदगी की धीमी शुरुआत

मन तो अभी भी बाल-अवस्था मे है
मस्तिष्क कहता है बड़े हो गए हो

किसकी बात मानूँ इसी कशमकश में दिन गुजर जाता है
सुबह से शाम तक हर पहर गिनता हुआ वापस लौट आता हूँ

उसी सिरहाने जहां सपनो को अधूरा छोड़ आया था सुबह
कि शायद इस रात में नींद में वो पूरे हो जाएंगे।

एक किताब तुम्हारी आँखों में

एक किताब तुम्हारी आँखों में

जब जब पलक झपकते हो
कुछ पृष्ठ पलट जाते हैं

अपनी कहानी कहने को
तुम्हारे होंठ थरथराते हैं

तुम अपने मन की यादों में
रहने चले जाते हो

कोई वो किताब पढ़ ले
इसलिए खुला छोड़ देते हो

अपनी आँखों मे यादों के पन्ने

Friday, August 24, 2018

रात

देखो बेख़ौफ़ सा कौन है जा रहा
इस रात में इस पहर
बढ़ती सिकुड़ती परछाइयों के बीच

लम्बे लम्बे डग भरता हुआ
हथेलियों को कोट में डाले
सड़क पर बारिश की काइयों के बीच

शाम से बारिश हो रही धीमे धीमे
लेकिन बेफिक्र होकर भीग रहा
अपनी आती जाती अंगड़ाइयों के बीच

उसका गंतव्य क्या है, निश्चित ही
उसको आदत है ऐसे सफ़र की
अँधेरी रात की गहराइयों के बीच

मैं खिड़की से देख रहा हूँ,
स्ट्रीट लैंप की रौशनी में उसका चेहरा
रात में भी चमक रहा है.

Thursday, August 2, 2018

बेचैन

बेचैन हूँ मैं कौन हूँ,ये सोचकर
मैं कौन हूँ, बेचैन हूँ ये जानकर

कहाँ खड़ा हूँ, किधर मुड़ा हूँ,
अपनी यादें रोके अवाक् पड़ा हूँ 

बहुत तेज़ धड़कता है,
दिल हर बात पर अटकता है

क्या सच है क्या स्वप्न मेरे
और क्या मेरे मन का भ्रम?

मेरे प्रश्न नहीं रुकते
मेरा अहम् नहीं सुनता

बेचैन हूँ मैं कौन हूँ, ये जानकर
मैं कौन हूँ, बेचैन हूँ ये सोचकर.



Wednesday, April 4, 2018

मैं निशब्द हो गया

तुमसे करने को बातें इतनी सारी हैं
व्यंग्य है, अवसाद है, हंसी ठिठोली है
यादों का पूरा गुलदस्ता है

दुनिया सिमट जाती है मुट्ठी में,
और कल्पना उड़ान भरने लगती है
विचारों का पूरा बक्सा है

वाद-विवाद और पंक्तियाँ कविता की
सुनाने को गीत, बनाने को किस्से
मेरी इच्छाओं का बस्ता है

लेकिन जब तुम सामने होती हो
सारी बातें हवा हो जाती है, सिर्फ
तुम्हारा चेहरा दिखता है

कोई शब्द पर्याप्त नहीं लगता
क्यूंकि तुम्हे बयां करने को शब्द नहीं बने है
या शायद तुमने मुझे निशब्द कर दिया है

कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

अरे तेरी जरुररत है, क्यूँ भाग जाता है
अभी यहीं थम के बैठ, मेरे पास वक़्त बिता
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे?

मैं जिस पल में आँख मूँद सोचता हूँ नाम उसका
उस एक पल में तू क्यूँ भाग जाता है
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

वर्तमान में, भविष्य में और भूतकाल में हो आता है
क्यूँ एक साथ हर समय में रहता है
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

मैं पिंजरे में बंद पन्छी हूँ, मुझे मेरी सीमा पता है
पर तू उन्मुक्त पवन है, फिर भी मुझे छोड़
कहाँ जाता है ऐ दिल मेरे

Sunday, February 21, 2016

प्रियतम रूसे बैठी.

कितने तारे देख गगन में
कितने तारे तोड़ के लाऊं
प्रियतम मुझसे रूसे बैठी
क्या करके मैं उसे मनाऊं

उसके रूप की करूँ प्रशंषा
या मन का मैं हाल सुनाऊं
उसकी भौंहे चढ़ी हुई हैं
कैसे उसका हिय पिघलाऊं

लेकर आया कांच की प्रतिमा
प्रतिमा तल पर बिखरी है
जाने कौन सी बात को लेकर
वो अब भी हम पर बिफरी है

मोती चुनके माला बुन लूँ
सीप अनोखे सारे चुन लूँ
कितना गहरा सागर ठहरा
कितने गोते कहो लगाऊं

मैं ठहरा निर्धन दरिद्र
सोने चांदी कहाँ से लाऊं
है जतन तो कोई मुझे बताओ
क्या करतब मैं कर दिखलाऊं

प्रियतम मुझसे रूसे बैठी
क्या करके मैं उसे मनाऊं

Thursday, April 17, 2014

हाँ हाँ, मैं भी "vote" दे रही हूँ इस बार.

सन २०१४ में कुछ आश्चर्यजनक हो रहा है. दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र (आबादी के आधार पर) भारत में इस बार आम चुनाव हो रहे हैं. इस बार ८१ करोड़ से ज्यादा भारतीय मतदान करने वाले हैं. इनमे से ११ करोड़ ऐसे हैं जो पहली बार मतदान करेंगे. यही नहीं, इन ८१ करोड़ मंदाताओं में से ४० करोड़ मतदाता युवा वर्ग यानि ३५ से कम आयु के हैं. मैं उसी युवा वर्ग का हिस्सा हूँ . एक ऐसा वर्ग जिसने भारत में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं.

मेरा ये मानना है कि हम सिर्फ आधुनिक जीवनशैली के वशीभूत जीने वाले लोग नहीं हैं जो २४ घंटे सातों दिन बारहों महीने अपने cellphone की स्क्रीन में डूबा रहता है. हम अपने आस पास की घटनाओं से अनछुए नहीं हैं. हम उसका हिस्सा है, हम युवा हैं एक नौजवान देश का. एक परिपक्व युवा वर्ग जो जीवंत है, आगे की सोच रखता है, पिछली रीतिओं और बन्धनों को तोड़ रहा है. एक ऐसा वर्ग जो सवाल पूछने से हिचकिचाता नहीं है. ये अभूतपूर्व परिस्तिथि है. इस बार आम चुनाओं में कुछ अद्भुत हो रहा है. ये युवा भारत है और ये कभी सोता नहीं है.


मैंने एक छोटा सा सर्वेक्षण किया. मैं अपनी महिलमित्र-मंडली के विचार जानना चाहता था इस बार हो रहे चुनावों और बदलते राजनैतिक समीकरणों के बारे में. मुझे कुछ अद्भुत देखने को मिला. आमतौर पर राजनीति से, चुनावी मुद्दों से, आर्थिक और सामाजिक सवालों से दूर रहने वाली लड़कियां न सिर्फ इन विषयों पर वाद-विवाद कर रही है बल्कि प्रश्न पूछ रही है. अपने विचारों को शक्ति के साथ सामने रख रही है. ये वही लड़कियां हैं जिनपर कभी "अपनी सीमा से ज्यादा" स्वछन्द होकर जीने के लिए, आधुनिक कपडे पहनने के लिए, आधुनिक सोच रखने के लिए सवालिया निगाहों से देखा जाता है, कोसा जाता है और हमारी संस्कृति को भ्रष्ट करने का आरोप झेलना पड़ता है. मुलायम सिंह और आजम खान जैसे नेताओं के बयानों को ये बारीकी से देख सुन और समझ रही है. शीला दीक्षित और ममता बनर्जी के स्त्री-विरोधी विचार भी याद हैं इन्हें.

मेरे सर्वेक्षण में तकरीबन 60 फ़ीसदी लड़कियां भारतीय जनता पार्टी और उसके प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी का समर्थन कर रही हैं. बाकि 30 फ़ीसदी आम आदमी पार्टी की सोच से प्रभावित हैं. केवल कुछ ही ऐसी थी जो अभी भी राजनीति को घृणा की दृष्टि से देखती हैं. और ये विचार किसी विज्ञापन या किसी धरने से प्रभावित नहीं थे. ये इनके अपने विचार थे. मैंने इन सबसे विस्तार से बात की और इनके समर्थन या विरोध का कारण भी पूछा. महिलाओं की सुरक्षा, सामाजिक और धार्मिक समानता, आर्थिक नीतियों पर सामंजस्य जैसे विषयों पर इन्होने अपने विचार दिए. इनके उत्तर ऐसे थे जो हमारे नेताओं को निशब्द कर देंगे. कुछ नया होने वाला है. पूरा देश इन्हें देख रहा है और ये पूरे देश को.

इन्होने तो तय कर लिया है. आप भी जागो. इस बार मतदान जरूर करना. भारत का भविष्य कैसा होगा ये अब हम पर निर्भर करता है.
जय हिन्द.

Sunday, December 22, 2013

ऐ शाम तू कब आई, पता ही नहीं चला.


मैं उगते सूरज की राह तकते, सोया नहीं था रात भर
ऐ शाम तू कब आई पता ही नहीं चला
कल समय से कहकर आना, तेरे आने पर धीमे चले
बहुत जलता है वो मुझसे जब तू मेरे साथ होती है
मेरे कन्धों पर हाथ रखा, हौले से मेरी पीठ थपथपाई
ऐ शाम तू कब आई .....

पहले तो रात से छुपा कर चिट्ठियां छोड़ दिया करती थी
तेरी आखिरी चिठ्ठी कब आई पता ही नहीं चला
देख रात नाराज़ है मुझसे, तू मेरे लिए उससे बात कर
अरसों से मुझे नींद नहीं आई 
ऐ शाम तू कब आई .......






Monday, October 7, 2013

मेरा अक्स, मेरा साया, घर का आइना और घुप्प अँधेरा

१. मैं खाता हूँ कसमे आईने की
    और तोड़ देता हूँ आइना ही. 
    चिर काल से कसम खा रहा हूँ,
    घर में एक भी शीशा नहीं बचा
    आखिर खफा किससे हूँ,
    आईने से या अपने वादों से
    या शायद अपनी सूरत से नाराज़ हूँ,
    कि अपने अक्स से नजरें नहीं मिलानी अब.

२. वक़्त रोज़ यूँ भागता हैं
    मानो कल मिलेगा नही
    एक शह दे रखी है जिंदगी ने
    मेरी मात का इंतज़ार है
    तैयार बैठे हैं सारे साए 
    अँधेरे कोनों में घात लगाये
    एक हम हैं जो हस देते हैं देखकर
    कि अपना साया भी कोने में छुप गया है अब.

Friday, August 30, 2013

रूपया, तेल और प्याज का तड़का.

-अजी सुनते हो, रूपया गिर गया है!
-कौन गिर गया?
-रूपया, अरे हमारा रूपया गिर गया है?
-कहाँ गिरा वो, चोट तो नहीं लगी?
-अरे! पूरी बात तो सुन लिया करो. बाज़ार में गिर गया,
  डॉलर के मुकाबले आज रूपया फिर से गिर गया.
-डॉलर? डॉलर से क्यूँ लड़ रहा था?
-अरे लड़ नहीं रहा था. हे भगवान्! अब तुम्हे कैसे समझाऊँ?
-क्या समझने-समझाने की बात कर रही हो? रूपया गिर गया है तो उसे मरहम लगाओ, चोट लगी होगी.
 एक काम करो जरा से तेल गर्म करके लगा दो.
-अरे तेल का तो नाम मत लो, ११२ डॉलर का एक बैरल मिलता है आजकल.
-ये तुम कौन से तेल की बात कर रही हो?
-अरे एक ही तो तेल है जी, कच्चा तेल! जिसके लिए आजकल अमरीका सीरिया जा रहा है लोकतंत्र स्थापित करने.
-अरे भागवान! मैं सरसों तेल की बात कर रहा हूँ.
-तो क्या रुपये की चोट पर अब सरसों लगाओगे? सरसों भी महंगा हो गया है. इस चोट का इलाज तो मनमोहन की FDI भी नहीं कर सकी.
-जब से ये अर्नब गोस्वामी का "Nation wants to know" शुरू हुआ है गृहणियां भी "Financial Experts"  बन गयी हैं.
-हुंह ! अगर हम न होती तो घर का "budget" कभी संभाल नहीं पाते.
-अच्छा, वो सब छोड़ो ये बताओ खाने में क्या बना है?
-दाल-चावल बने हैं. फ्रिज में पड़े हैं, निकल कर खा लो. मैं "Times Now" देख रही हूँ.
-अच्छा एक काम करो, कम से कम तड़का तो लगा दो. मुझे "उतरन" देखनी है.
-एक मिनट रुक जाओ, "GDP" के बारे में बता रहे हैं. और हाँ! प्याज ८० रुपये किलो हो गया है, सिर्फ जीरे का तड़का लगाओ अब.

Monday, August 26, 2013

दो पैरों में दो चप्पलें

बदरा छाई, बरसी गरज गरज कर
हम किताबें कमीज़ में छुपाये दौड़े

तन भीगा, सर को झांप झांप कर
हमने बाधा-धावकों के रिकॉर्ड तोड़े

ट्रक आया, पानी छपक छपक कर
हमे मिट्टी का रंग लगाता गया

और साइकिल सवार एक युवक, उस
ट्रक चालक को मीठे बोल सुनाता गया

सड़क खो चुकी थी छोटे तालाबों में, मेरा
हौसला कमर तक कीचड़ में समाता गया

आँखें आधी बंद पड़ी, भरी दोपहर
दो पल में काली रात सी हो गयी

पानी से पाँव बचाने के क्रम में
हमसे एक भारी गलती हो गयी

जिसको ठोस जमीन समझकर कूदें
उस रेत में पाँव खम्बे सा खड़ा हो गया

मेरी एक चप्पल उलझकर टूट गयी
मुझे देख हर मुखड़ा ठहाके लगा गया

तब से दोनो  पैरों में अलग अलग चप्पलें हैं
और लोग समझते हम कोई फैशन मॉडल हैं.

Wednesday, August 14, 2013

इतना सेंटी क्यूँ होते हो, झंडा ही तो है.

१५ अगस्त २०१३, आज़ादी की ६६वी वर्षगांठ आ गयी. लीजिये, सरकारी छुट्टी है आराम से घर पर मौज करने का दिन है. हफ्ते के बीच का रविवार मान लीजिये. जिनके घरों में बिजली होगी वो दूरदर्शन चला लेंगे, नहीं तो शाम को बाकि खबरिया चैनलों पर दिखा ही दिया जायेगा दिल्ली का "झंडोतोलन समारोह".
वैसे भी अब पहले जैसा माहौल कहाँ रहा. पहले प्रभात फेरियां निकला करती थीं. अब भी निकलती होगी दूर  दराज के गाँवों में, पर, हम तो शहर में रहते हैं जी. जिनके दफ्तरों में अनिवार्य है की आना ही पड़ेगा, वो बिचारे सुबह सुबह जायेंगे आधे घंटे देश प्रेम व्यक्त करने. जो अभी स्कूल या कॉलेज में पढ़ते हैं वो भी जायेंगे.
आजकल राष्ट्रगान तो सिर्फ बच्चे ही गाते हैं. समझ नहीं है न इनको कि ये सब जो इन्हें सिखाया जा रहा है, ये जो देश प्रेम की घुट्टी पिलाई जा रही है, असल जिंदगी में इनका कोई महत्व नहीं है. कल ये भी रिश्वत देंगे, सिग्नल तोड़ कर ५० रुपये का नोट पकड़ा देंगे और अगर किसी को ठोक दिया सड़क पर तो वकील कर लेंगे.
सजा तो सिर्फ गरीबों को होती है. गरीब होने की सजा. पर मेरा देश आज़ाद है. येहाँ सड़क पर मूतने की आज़ादी है, चूमने पर पुलिस पकड़ लेती है. १४-१५ साल के बच्चों के शादी अगर माँ-बाप करा दे तो कोई सर नहीं पीटता पर अगर वही कोई २१ साल की लड़की अपनी मर्ज़ी से शादी करले तो वर-वधु दोनों कटे हुए मिलेंगे. यहाँ मूंछों के लिए अपनी ही बेटी अपनी ही बहिन को मार डालने की आज़ादी है. यहाँ लड़किओं को आज़ादी है बलात्कार का शिकार होने की. पुलिस को आज़ादी है सोती हुई सभा पर डंडे बरसाने की, शांत भीड़ में औरतों, बच्चों बुजुर्गों पर आंसू गैस छोड़ने की. यहाँ सैनिकों को आज़ादी है नेताओं की रक्षा करने की, सीमा पर सर कटाने की. यहाँ माओं को आज़ादी है शहीद बेटे की तिरंगे में लिपटी लाश का इंतज़ार करने की. और नेताओं को आज़ादी है ये कहने की, "सैनिक तो शहीद होने के लिए सेना में भरती होता है" . यहाँ अखबारों को आज़ादी है सरकार के अनुसार खबर छापने की. यहाँ बहुत आज़ादी है मेरे साथियों. यहाँ आप आज़ादी से बेरोजगार घूम सकते हैं. यहाँ बड़ी स्वतंत्रता से अनाज की, फल सब्जी की बोरियां गोदामों में सडती है. आप स्वतंत्र होकर "लोन" पर कार खरीद सकते हैं. अगर आप रेत माफिया हैं तो किसी भी नदी के तट से खुले आम रेत उठाकर बेच सकते हैं. बापू ने नमक भी तो ऐसे उठाया था न. अगर आप सरकार है तो खेती की जमीन को औने पौने दामों में कारखानों के लिए बेच सकते हैं. ऐसी आज़ादी और कहाँ.
अपना उबलता खून शांत रख कर घिसटती हुई जिंदगी पर व्यंग्य कस सकते हैं. फिल्मों और फिल्म कलाकारों की पूजा कर सकते हैं. अपने "लोन" पर बनाये घर के बगीचे में बैठ कर यह कह सकते है "नेताओं ने देश बर्बाद कर दिया". आप सबको देश की आज़ाद होने की ६६वी सालगिरह मुबारक. कल सुबह सड़क पर प्लास्टिक का
"मेड इन चाइना" तिरंगा नाली में गिरा मिले तो उठा लेना. ये मत कहना, झंडा ही तो है.

Thursday, July 4, 2013

जो मैं हूँ.

मैं एकाकी, मैं शर्मीला,
मैं हठधर्मी, मैं वैरागी,
मैं अपने आप से बातें करता गृहत्यागी
मैं चिन्तक, मैं संकोची,
मैं अल्हड़, मैं अनुरागी,
मैं चढ़ा त्योरियां प्रश्न पूछता एक बागी.

Sunday, April 21, 2013

हम दिशाहीन नहीं थे, बनाये गए!

File:StateLibQld 1 295751 Eighteen footer sailing boats racing in the Australian Championship on the Brisbane River, ca. 1930.jpg 

कोई प्रश्न नहीं पूछा, कोई व्याख्या नहीं दी
इक तस्वीर दिखाई पनघट की
और छोड़ दिया
उफनते विचारों के बीच भंवर में
कोई दिशा निर्देश नहीं, कोई पतवार नहीं थी
बस नौकाओं की कतार हर कहीं
सो  मोड़ दिया
नौका का रुख, कस के डोर कमर में
उस ओर जहाँ सब नौकाएं बढ़ी जा रही थी
सबको बस पहुँचने की जल्दी थी
लहरें आतुर थी
भीतर अपने हमें समाने के चक्कर में
एक द्वीप दिखा सागर में, नौकाएं सबकी
टकराईं, हमने भी तुमने भी
और तोड़ दिया
नौका को सपने सा, निहत्थे महा समर में
हम लड़ते रहे व्यर्थ उनके मनोरंजन के लिए
जिन्होंने तट पर बने महलों में
बैठ हमें पनघट का चित्र दिखाकर
और जलपरिओं की कथाएं सुनाकर
दिशाहीन बनाया
और छोड़ दिया
उफनते विचारों के बीच भंवर में.

चित्र wikipedia से लिया गया है, अगर ये आपकी अधिकारिक संपत्ति है तो मेसेज करें और मैं इसे हटा दूँगा.

Monday, March 25, 2013

शक्ति का संघर्ष (II) - धर्मं

जारी ..
अपने  इस लेख के माध्यम से मैं शक्ति के संघर्ष को विस्तार से परिभाषित करने का प्रयास कर रहा हूँ. मैं स्वयं इस खोज में लगा हूँ कि आखिर शक्ति के आज के इस विश्वस्तरीय संघर्ष में सबसे अहम भूमिका किसकी है?
क्या वो धर्म की है, या जाति की, या भाषा की, या राष्ट्रवाद की, या लिंग की, या फिर पैसे की?
क्या ये अपना वर्चस्व स्थापित करने की लड़ाई है?
या फिर ये सिर्फ अपना अस्तित्व बरक़रार रखने का संघर्ष है?

हमारा ईश्वर तुम्हारे ईश्वर से बड़ा है.

तुम्हारा ये लिबास हमसे मेल नहीं खाता, 
तुम्हारी भाषा हमें समझ नहीं आती,
तुम्हारा  रंग चेहरे का हमे रास नहीं आता,
तुम्हारे घर की छत इतनी ऊँची क्यूँ,
तुम्हारा खान पान भी हमे नहीं भाता
 तुम हमसे भिन्न हो, तुम्हे इसका दंड मिलेगा
क्यूँकि तुम ठहरे बीस हम सहस्त्र हैं खड़े
तुम्हारा सत्य नगण्य है हमारे सत्य के समक्ष
 इसलिए हम सही हैं और तुम गलत.
हमे चुना गया है तुम्हे सही राह दिखाने को
क्यूंकि हमारा ईश्वर तुम्हारे ईश्वर से बड़ा है.




इतिहास के पन्नों में अंकित है कि मानव सभ्यता पिछले ८००० वर्षों के दौरान, सिर्फ ३०० वर्षों में शांति के साथ रही है अन्यथा परस्पर विवाद और युद्ध होते आ रहे हैं. धर्म ने शक्ति के संघर्ष में आग में घी की भूमिका निभाई है. ये सिर्फ हमारा एक सुखद भ्रम है कि ईश्वर और धर्म मनुष्य के जीवन में सुख और शांति प्रदान करते हैं.
धर्म की चर्चा को मैं यहाँ एक विराम दे रहा हूँ.

समाप्त


Wednesday, March 20, 2013

शक्ति का संघर्ष (II) - धर्म

जारी ....
धर्म की उत्पत्ति, विकास और प्रभाव 

पिछली कड़ी में मैंने ये बताने कि कोशिश की थी कि कैसे धर्म शक्ति हासिल करने और लोगों पर शासन करने का एक माध्यम है. लेकिन अगर मैं सिर्फ यही कहने तक सीमित रह जाऊं कि धर्म सिर्फ शक्ति अर्जित करने का माध्यम था और कुछ नहीं तो मैं आपको सारे तथ्य नहीं बता पाऊंगा.
प्रकृति के संसाधन हर किसी को बराबर भाग में नहीं मिलते. संसार की हर प्राचीन सभ्यता एक दूसरे से विषम परिस्तिथिओं में विकसित हुईं हैं. इसीलिए उनके ईश्वर और धार्मिक ग्रन्थ भिन्न हैं. पर एक मूलभूत विचार जो हर धार्मिक ग्रन्थ और हर नयी पुरानी सभ्यता इतिहास में साफ़ साफ़ अंकित है वो है प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाना और प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल करना. जब पृथ्वी पर सभ्यताओं के अंकुर फूट रहे थे तब मनुष्य का जीवन अव्यवस्थित और अराजक था. ऐसे में मानव समाज को, जो विश्व की महान नदियों और समुद्र के किनारे फल फूल रहा था, दिशा और नियम की आवश्यकता थी.
यही वो महत्त्वपूर्ण समय है जब धर्म ने मनुष्य को प्रकृति से जोड़ा और प्राकृतिक संसाधनों का आदर करने के लिए कई धर्मों ने उन्हें ईश्वरीय रूप दिया. इन नियमों को मानने या न मानने पर मनुष्य के पास पुरस्कार या दंड के ही विकल्प थे.
इसके अलावा हर धर्म के ऋषिओं, पैगम्बरों और गुरुओं ने प्रकृति के नियमों को समझने और समझाने का भी प्रयत्न किया. ऋतुओं के चक्र का उल्लेख हुआ , पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और प्रमुख ग्रहों के प्रावेदन और उसके कथित प्रभावों का भी अध्ययन किया गया.
धर्म ने समाज में नैतिकता प्रयुक्त की और सही गलत में अंतर बताने के लिए एक शक्तिशाली , अपरिमित और निष्पक्ष ईश्वर स्थापित किया. ये सभ्यताओं का स्वर्णिम समय था.

पर शक्ति किसी को भी भ्रष्ट कर सकती है चाहे वो धर्म हो या मनुष्य. और अपने शक्ति के अहंकार में धर्म के प्रचारकों ने अपनी त्रुटियाँ देखने से इनकार कर दिया. विज्ञान पढ़ने और पढाने वालों को कैद किया गया, यंत्रणा दी गयी या हत्या कर दी गयी. धर्म में संशोधन और विकास की कोई गुंजाइश नहीं रखी गयी.
धर्म ने पुरुष और स्त्री में भी भेदभाव किया और लगभग सभी प्रमुख धर्मों ने स्त्री को अधीनस्थ बताया. (नारी-शक्ति के ऊपर विस्तार से चर्चा अगले भाग में करूँगा.)
जब कोई भी वस्तु शिथिल हो जाती है तो वह निष्क्रिय होने लगती है. इसलिए मेरे अनुसार आज संसार के सभी प्राचीन धर्म लगभग निष्क्रिय हो गए हैं और वर्तमान में ये नकारात्मक बल का ही काम कर रहे हैं. शक्ति के संघर्ष में "धर्म", "अर्थ" (मुद्रा) और "राज्य" (state/administration) के सामने फीका पड़ने लगा है. लेकिन आज भी "धर्म" मनुष्य के जीवन का और हमारे समाज की व्यवस्था में एक  महत्त्वपूर्ण अंग है.
.
.
...क्रमशः

Followers